अस्मिता की आवाज़

एक जिन्दा सी लड़की मृत हो गयी जीते जी अस्तित्व खो दिया

नैतिक मूल्यों की विलुप्त सत्ता में उसकी अंतरात्मा पर प्रहार हो रहा

कैसा समाज है ये हमारा जहाँ दोष किसी का दोषी कोई ओर हो रहा

अस्मिता पर उसकी प्रश्नचिन्ह लगा दिए जो बैठे हैं आसीन पदों पर

हैं समाज के ठेकेदार वहीं क्या जीने का भी हक़ वो देंगे क्या

जीवित होकर भी जीने का अधिकार छीन रहा

पुरुष के सत्तामयी समाज में फिर प्रश्न नारी की ही ओर उठ रहे

अधिकारों की बात करते हैं ये लेकिन जीवन का अस्तित्व छीन रहे

ऐसे कृत्यों के दोषी को मानसिक रोगी बताकर दोष नारी पर ही मंढ रहे

खुद एक रोग से ग्रस्त समाज ये जीने की परिभाषा बता रहा

कैसी होगी वेशभूषा उसकी चारों ओर यही प्रश्न उठ खडे हुए हैं

पुरुष के गुनाह को एक ग़लतीभर बताकर नारी के जीवन की स्वतंत्रता का अधिकार छीन रहे

आये दिन बलात्कार हत्या हो रहीं बस मोमबत्ती लगाकर अपने कर्तव्यों को पूर्ण मानते

आधुनिकता के समाज में खुद को ये आधुनिक हैं कहते

क्या यही समाज का आधुनिक रूप है

जो जीने की बात हैं करते वही कदम कदम पर अपमानित कर रहे

क्या यही दोष है उसका केवल जीवन जीने को अपना अधिकार माना

एक उसकी अस्मिता का दोषी, एक उसके अधिकारों का दोषी

फिर भी इस समाज में दोषी नारी

ऐसा होता है आखिर क्यों हर बार यही प्रश्न उठ होते खडे हैं

न्याय के लिए भी दर दर आज फिर से भटक रही है नारी

दोषी घूम रहा है खुलेआम फिर भी दोषी हो गयी नारी

बस दोष यही था उसका कि पुरुष के सत्तामयी समाज में पँख फैलाकर उसने जीना चाहा

अभी तो उड़ भी नहीं सकी थी ठीक से,

पंखो को उसके काट दिया, ख़त्म कर दी पहचान उसकी

उसके उड़ने को दोषी बना दिया

क्यों नहीं समझते हैं सब जन समाज में

कपड़ो को दोष दे देते हैं, कपड़ो से अगर बलात्कार रुकते

तो खिलौनों से खेलती बच्चियाँ किसी की  हैवानियत का शिकार ना बनती

ना रोते आज माता पिता बेटियों को जन्म देकर

भयाक्रांत इस सम्माज में डर डरकर हैं वो जी रहे

ये कैसा समाज है जो हर बार दोष नारी पर ही गढ़ रहा |

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पिता

माँ के प्यार ने जीना सिखाया दुनिया में

तो पिता ने विश्वास से लड़ना सिखाया

लड़ रहे थे जिंदगी से उम्मीदों की डोर लिए हम

अहसासों के निर्जन वन में दूर बढ़ते चले जा रहे थे हम

जंहा समाज के भी कटु प्रश्नों के तीखे ताने थे

संघर्षो की इस जीवन डोर में

पिता ने फिर उम्मीद की लौ को जलाया

जब-जब हम निराश हुए खुद से

पिता के विश्वास ने आत्मबल हमको प्रदान किया

डगमगाते क़दमों से भी जीने का फिर से उत्साह किया

ऋणी रहेंगे मात-पिता के सदैव हम

ये जीवन न्योंछावर उनको मेरा

कर सकूँ जीवन में उनके लिए कुछ

तो ये जीवन सफल हो जाए

क्योंकि जीवन की हर खुशी और उम्मीदों की डोर उनसे है

कुछ नहीं है देने को मेरे पास उनको

बस इस जीवन का हर एक पल समर्पित उनको

क्या कहूँ और उनके बारे में

जीवन की इस धूप-छाँव में पिता ने हमको

खुद पर विश्वास और खुद से लड़ना सिखाया

गहन अँधेरे के सफर में पिता ने फिर से

जीवन ज्योति का दीपक जलाया |

माँ

नदिया की बहती धार है माँ

पेड़ों की शीतल छाँव है माँ

उस माँ के बारे में क्या कह पाऊँगी

हर नन्हें क़दमों का सहारा है माँ,

नदिया की बहती धार है माँ पेड़ों की शीतल छाँव है माँ |

जिसकी गोदी में पलकर बड़े हुए

जिसके आँचल की ओढ़नी सदा ओट बनी

उस माँ के बारे में क्या कह पाऊँगी

सदा तेरी आँखों का तारा है माँ,

नदिया की बहती धार है माँ पेड़ों की शीतल छाँव है माँ |

हम मिट्टी में खेले-कूदे हरदम माँ

कभी तूने हमको ना डाँटा माँ

माँ तेरे बारे में क्या कह पाऊँगी

तूने पल – पल प्यार हम पर वारा माँ,

नदिया की बहती धार है माँ पेड़ों की शीतल छाँव है माँ|

सदा तेरे प्यार की हमको जरूरत है

मन में विश्वास आ जाता है ज़ब सर पर हाथ तू रखती है माँ

तेरे बारे में क्या कह पाऊँगी

हर बच्चे का जीवन है माँ,

नदिया की बहती धार है माँ पेड़ों की शीतल छाँव है माँ |

जिंदगी की कश्मकश…

जिंदगी भी अजीब है यारों,

जब जीने की चाह हुई तो दम तोड़ने लगी,

फिर मन मे ख्याल आया कि वो भी क्या दिन थे,

जब बचपन था तो हम बड़े हो गये समय से पहले,

और जब बड़े हुए तो बचपन जीने का मन किया,

उस बचपन मे लौट जाने का मन किया,

लगा कि इस जिंदगी के पीछे तो एक ओर चेहरा है,

कुछ अजीब सी कश्मकश चल रही थी जिंदगी मे

लगता है हम जी तो रहे हैं लेकिन साँसें छीन सी गयी थी फिर भी हम शान से जिए जा रहे थे,

जैसे इस दौड़-भाग कि जिंदगी मे जीना ही भूल गये हो,

और जब जीने का मन किया तो जिंदगी ही नहीं बची थी|

फिर उम्मीदें जिन्दा सी हो गयी थी एक दिन,

सोचा थोड़ा गुफ़्तगू कर ले खुद से हमने पाया हम तो छोड़ आये थे बहुत कुछ पीछे,

बस बची रह गयी तो एक टीस सी मन मे और वही कसक आज हमें चुभन दे रही थी,

देखा ज़ब पीछे मुड़कर हमने,

तो समाज के ताने-बाने मे उलझकर रह गयी थी जिंदगी,

जिंदगी भी अजीब है दोस्तों कुछ नहीं बचा था शेष|

रिश्ते

प्यार में सच्चाई, निश्छलता और विश्वास होना ही प्यार को पवित्र बनाता है।हमारे रिश्ते किसी के लिए भी हो माता-पिता, भाई-बहिन,दोस्त उनमेंप्यार और सच्चाई होनी चाहिये तभी ठहरते हैं जीवन में।

सोचती हूँ कि क्या लिखूँ क्योंकि शब्द ही नहीं मिलते उनके लिए तो फिर सोचा कि हमें आज के समय में यदि उन्हें कुछ देना ही है तो केवल उन्हें अपना समय व प्यार दें और उनका सदैव ध्यान रखें क्योंकि हमारा जीवन सदैव अपने माता-पिता का ऋणी रहेगा और जिस ऋण से हम कभी ऊऋण नहीं हो सकते,और इसे हम सरल शब्दों में कहें तो इसे हम अपने प्यार से ही पूर्ण कर सकते हैं।इसलिये यह अक्षरशः सत्य ही है कि माता-पिता तो हमारे लिये परमात्मा का दूसरा रूप हैं….

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