रक्षा-सूत्र

रक्षाबंधन पर्व पर विशेष कविता (रक्षा-सूत्र )

भाई – बहिन के मिलन का ये पवित्र पर्व है रक्षाबंधन|एक दूसरे से लड़ते झगड़ते रहकर एक दूसरे को से मना लेते हैं और वो मनाना भी कोई ऐसा नहीं कि झुककर एक दूसरे को मनाएंगे वरन जिद से लड़कर एक दूसरे को मनाते हैं यही होता है भाई बहिन का प्यार |उस प्यार की तुलना हम किसी से नहीं कर सकते क्योंकि उस प्यार में एक जिद होती है कि हम लड़ेंगे भी वही और रहेंगें भी साथ में ही |एक दूसरे के लिये सभी कुछ करने के लिये तैयार रहना भाई की हर छोटी बात का ध्यान रखना उसे क्या चाहिए यही प्यार होता है बहिन का उसे डांट पड़ने से बचाना सभी की जो विशेष ना होकर भी बहुत अनमोल होता है और वही बातें हमेशा याद आती हैं |भाई का बहिन की हर बात के लिये समर्थन करना यही प्यार है बस जो सबसे ज़ुदा है |रक्षाबंधन कविता में मैंने इन्ही भावनाओं को पिरोने की कोशिश की है|

कविता (रक्षा-सूत्र)

खुशियों की सौगात होती हैं राखियाँ,

भाई के वचनों का उपहार हैं ये राखियाँ |

दिल में उमंगों की आस भी हैं राखियाँ,

हर दिल की दूरियों की बिछुड़न को भुला देती हैं राखियाँ |

अंतर में उमड़े भावों का एहसास हैं राखियाँ,

मिलन के संगमन का पर्व होती हैं राखियाँ |

बंद लिफाफे में सिमटी बंधन की डोर हैं राखियाँ,

दिलों के फ़ासले को जो मिटा दें वो एहसास हैं राखियाँ|

यूँ तो धागा होता है एक रेशम की डोर,

कलाई में बँध जाये तो रक्षा-सूत्र बन जाती हैं राखियाँ|

अनजाने दिलों को भी ये पिरोती हैं रिश्ते में,

सीमा पर खडे हर जवान का कवच होती हैं राखियाँ |

हर बहिन के मन का सच्चा विश्वास होता है हर भाई,

रूँठे हुए दिलों को भी मनाती हैं ये राखियाँ |

दीपक, रोली, चावल, मोली शुभमंगल प्रतीक हैं संस्कृति के,

आने वाले पर्वों का शुभारम्भ होती हैं राखियाँ |

तृष्णा

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साहित्य सुमन मंच की ‘विशेष रचना’ के तहत पूरे हफ्ते किसी खास शीर्षक पर मंच की विशिष्ठ महिला रचनाकार की रचना मेरी ओर से प्रेषित की जाती है.
इस हफ्ते का शीर्षक है ‘तृष्णा ‘. इस क्रम में आज की दूसरी रचना मैं मंच की लोकप्रिय रचनाकार डॉ गरिमा त्यागी जी की प्रेषित कर रही हूँ. इनकी रचना आप भी अवश्य पढ़ें…✍️

तृष्णा
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मन तो एक ऐसा समंदर है,

जिसमें लहरों की अनगिनत इच्छाओं की तृष्णा है |

खुशियाँ मेरी मृग- मरीचिका जैसी,

जिसको जितना पाने की कोशिश करे कम है |

मृगतृष्णा – सा बन गया जीवन,

सैलाब आँसुओं  का जिसमें भरा बेहिसाब है |

संदेह की कश्ती में डोलती है ज़िंदगी,

भ्रम के तिमिर रूपी तृष्णा में डूबा जीवन है |

हम तो कठपुतली हैं, बस प्रभु के रंगमंच के,

जिसमें हम खेल रहे अपना जीवन हैं |

बुझा दो आकर ये प्यास तृष्णा – रूपी भगवन,

पट खोल दो हृदय के मेरे जिसमें बंद मेरा आत्मिक मन है |

हो जाऊँ मैं प्रभुमय अब तो प्रभु में,

ऐसी एक लगन लगी मेरे मन में है |

-डॉ. गरिमा त्यागी

बरसात

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साहित्य सुमन मंच की ‘विशेष रचना’ के तहत पूरे हफ्ते किसी खास शीर्षक पर मंच की विशिष्ठ महिला रचनाकार की रचना मेरी ओर से प्रेषित की जाती है. इस हफ्ते का शीर्षक है ‘ बरसात ‘. अत: इस क्रम में आज की दूसरी रचना मैं मंच की
सक्रिय व् बेहतरीन रचनाकार डॉ गरिमा त्यागी जी की प्रेषित कर रही हूँ. इनकी रचना आप भी अवश्य पढ़ें…✍️

बरसात

आज भी याद हैं, वो पुराने दिन
वो बचपन की यादें, वो विस्मृत से पल,
यादों का घनेरा सोने नहीं देता था मुझे,
बेचैन से मन को रोने भी नहीं देता था.
रेत का घरौंदा बनाती रहती हूँ बार – बार,
बन जाता है मकान, बस घरौंदा नहीं बनता,
वो सुकून आज खो- सा गया है कहीं,
तन तो भीग जाता है बरसात में आज भी,
ये मन है कि फिर भी भीग नहीं पाता है.
हँसते हुए चेहरे यूँ तो मरहम हैं मेरे मन के,
लेकिन ख्वाहिशों से बना घाव,
एक पल में ही नासूर जख्म बन जाता है.

-डॉ. गरिमा त्यागी

डोर

https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=1856655707823081&id=100004360087771 साहित्य सुमन मंच की ‘विशेष रचना’ के तहत पूरे हफ्ते किसी खास शीर्षक पर मंच की विशिष्ठ महिला रचनाकार की रचना मेरी ओर से प्रेषित की जाती है.
इस हफ्ते का शीर्षक है ‘डोर’. इस क्रम में आज की रचना मैं मंच की बेहद मेहनती रचनाकार डॉ गरिमा त्यागी जी की प्रेषित कर रही हूँ. इनकी रचना आप भी अवश्य पढ़ें…✍️

डोर

डोर जीवन की होती है नाजुक बहुत,

प्रेम से मजबूत बना लो इसको ज़रा,

रिश्तों को अपना बना लो अब तो ज़रा,

ज़िंदगी के फ़लक में रंग होते हैं यूँ तो हज़ार,

रंगों से बस्तियों को सजा लो अब तो ज़रा,

कच्चे धागों से बँधा है जीवन हमारा,

कुछ सपने सजा लो अब तो ज़रा |

प्रीत से सभी को अपना बना लो कुछ तो ज़रा,

मन के मीत बना लो अब तो ज़रा,

दूरियाँ दिलों की मिटा लो अब तो ज़रा,

दिलों से दिलों को मिला लो कुछ तो ज़रा,

ये बंधन निभा लो कुछ तो ज़रा,

कच्चे धागों से बँधा है जीवन हमारा,

सभी को गले से लगा लो अब तो ज़रा |

-डॉ गरिमा त्यागी

डायरी

सामयिक परिवेश यूपी अध्याय पटल पर अप्रवासी भारतीय विशेषांक ई पत्रिका का विमोचन समारोह एवं कवि सम्मेलन का आयोजन 💐💐💐
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जय माता दी 🙏🙏🙏 सभी को नवरात्रि की अनंत मंगल कामनायें 💐💐💐

पतन

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साहित्य सुमन मंच की ‘विशेष रचना’ के तहत पूरे हफ्ते किसी खास शीर्षक पर मंच की विशिष्ठ महिला रचनाकार की रचना मेरी ओर से प्रेषित की जाती है.
इस हफ्ते का शीर्षक है ‘पतन’. अत: इस क्रम में ‘पतन’ शीर्षक पर मैं आज की रचना मंच की बेहद सक्रिय व उत्कृष्ट लेखन पर बेहतरीन कार्य करने वाली रचनाकार डॉ गरिमा त्यागी जी की प्रेषित कर रही हूँ. इनकी रचना आप भी अवश्य पढ़ें…✍️

पतन

कैसी हाशिये पर आ गयी है ज़िंदगी,

कभी मुफलिसी, कभी बेचारगी |

गिराकर ज़मीर भी अपना,

बैठ जाते हैं ऊँचे पायदानों पर,

हारती है बस भूखमरी, लाचारगी,

कैसी हाशिये पर आ गयी है ज़िंदगी |

हर तरफ भरी है दर्द ओर माज़ूरी,

कैसी हाशिये पर आ गयी है ज़िंदगी |

पतन अब किसे कहेंगे हम यहाँ,

पतन भावनाओं का हो रहा हो जहाँ |

बिक रहे हैं अब मूल्य भी अब तो हर चौराहे पर,

हवाओं में भी रूह के पतन की अब बढ़ रही है गंदगी |

रो – रोकर कथा ये कह रही है नित नयी,

कैसी हाशिये पर आ गयी है ज़िंदगी |

डॉ. गरिमा त्यागी (Akshrash sahitya)

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होली

रंग-रूप अलग हैं ख्याल,तरंगअलग हैं,
इस वसुधा के तो देखो ढाल और ढंग
अलग हैं।
सभी को निकट से निकटतम दिल के बना
लो,
मिल जाते हैं सब रंग इस फाग में,
होली का ये तो चलन अलग है।
✍️✍️✍️डॉ.गरिमा त्यागी

सभी को होली की अनंत शुभकामनायें 💐💐💐

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