मकर संक्रांति

(मकर संक्रांति )

मन के भावों का यूँ बह जाना,

दिल में प्यार के रंगों का बिखर जाना,

याद है मुझे वो नील गगन की भोर पतंगों के दिन,

सभी का हँसकर यूँ मिलना और मिलाना |

खुशियों की बौछार में सभी का यूँ भीग जाना,

इंद्रधनुषी सतरंगी रंगों में भी यूँ रंग जाना,

बड़ी मीठी-सी यादें वो मुझे याद हैं,

कँही गुड़ मुरमुरे तो कँही तिल का महक जाना |

गंगा दर्शन को जन – जन का उमड़ जाना,

गान मिलकर मंगल – कीर्तन के गाना,

याद है उनका तान भरकर के यूँ मगन हो जाना,

याद है बालकों का हंसकर यूँ ठिठोलियाँ करना |

स्वरचित
✍️✍️✍️डॉ गरिमा त्यागी

स्वामी विवेकानंद जी

“वेद-उपनिषदों का मुक्त कण्ठ से मंजुल प्रचार किया |

आत्म ज्ञान एवं भक्ति का नवरक्त वाहकों में अथाह प्रसरण किया |

अतीत वर्तमान के थे वे ऐसे सेतु,

आर्यावर्त्त की संस्कृति का उन्होंने उन्मुक्त प्रसार किया |”

विश्व-नायक एवं जन-प्रणेता स्वामी विवेकानंद जी को जन्मदिवस का सादर प्रणाम 🙏🙏🙏

आप सभी को युवा दिवस की अनंत शुभकामनायें 💐💐💐

✍️✍️✍️डॉ गरिमा त्यागी

हिंदी (चित्त की भाषा )

आप सभी को विश्व हिंदी दिवस की अनंत शुभकामनायें 💐💐

हिंदी ( चित्त की भाषा )

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हर भाव का भाव से सम्मिलन जो कराती,

ऐसे हर भाव को बयाँ करने का हुनर रखती है |

शिशु के मुख से भी निःसृत प्रथम शब्द है हिंदी,

वो तो परिंदों को भी स्वर देने का फ़न रखती है |

स्वरचित
✍️✍️✍️डॉ गरिमा त्यागी

माननीय अटल बिहारी वाजपेयी

व्यक्तित्व की मुखरता जिनकी विशाल थी,

अद्भुत गौरवमयी प्रतिभा लालित्यपूर्ण थी |

दृढ व्यक्तित्व था उस महापुरुष का यूँ तो,

वाणी में शारदे की कृपा विराजमान थी |

औदार्य, तेज से आनन शोभायमान था,

दृढता, गुरुता व अटल व्यक्तित्व था |

माधुर्य और सहजता के धनी विस्मित स्वर,

वाणी में तो उनकी विद्यमान था |

काव्य -सलिला से रंग बिखेर देते थे,

शब्दों की कूची से मानस पटल को रंग देते थे |

लेखनी की बयार ज़ब चलती थी पन्नों पर,

हर पन्ने को सतरंगी कर देते थे |

जुदा था व्यक्तित्व उनका, जुदा हर रंग था,

कुशल नीतिज्ञ व चातुर्य भी महान था |

तारों के फ़लक में चाँद की महिमा जैसे,

इस धरा की भीड़ में व्यक्तित्व भी महान था |

स्वरचित

✍️✍️✍️डॉ गरिमा त्यागी

हाल -ए दिल बयाँ

“ हाल -ए दिल बयाँ ###########

“शब्दों की बयानबाजी हरदम अच्छी नही होती,

लफ़्ज़ जो कह नहीं पाते, ख़ामोशी वो बोल देती है |”

स्वरचित

✍️✍️✍️डॉ गरिमा त्यागी 

 

लगाव

कहते हैं जितना प्रेम इंसानों को होता है उससे कँही ज्यादा प्रेम और अपनापन पशु – पक्षियों को होता है इसका साक्षात् प्रमाण अक्षत ने तब पाया ज़ब उसके दादा जी का स्वर्गवास हों गया था |

उसने देखा था कि कैसे उसके दादा जी ज़ब भी खाना खाते तो रोटी के छोटे – छोटे टुकड़े बनाकर रख लेते |ये उनका प्रतिदिन का कार्य था क्योंकि जैसे ही उसके दादा जी खाना खाने बैठ जाते तो कुछ चिड़ियाँ उनके पास आकर बैठ जाती थी, इतना ही नहीं कुछ तो उनकी चारपाई पर भी आकर बैठ जाती थीं और वह उन्हें छोटे – छोटे टुकड़े जो तोड़कर रखते थे उन्हें एक – एक करके डालते रहते थे और ज़ब तक खाना खाते, वह रोजाना ऐसे ही उन्हें भी खाना खिलाते थे और ज़ब वह खाना खा लेते थे तो चिड़ियाँ फुर्र – फुर्र करके उड़ जाती, उनका रोजाना का यही कार्य था |

घर के सभी लोग ये सब देखते कि कैसा अपनत्व था और कैसे उन्हें पता चल जाता कि वो उसी समय आकर उनके पास बैठ जाती हैं |अक्षत भी ये सब देखता था लेकिन आज वह सब कँही खत्म- सा हो गया था, क्योंकि उसके दादा जी नहीं रहे थे लेकिन चिड़ियाँ आज भी वँही बैठी थी आकर, प्रतीक्षा मे थीं कि कब उन्हें कोई टुकड़ा डालेगा,दाना तो डाला गया था उन्हें,बस तरीका बदल गया था आज लेकिन वह भाव और लगाव नहीं था आज वह|सब कुछ वैसा ही था बस नहीं था वह इंसान जो उनके लिये दाना देता था उनकी भूख शांत करता था, उनमे वो चहचहाहट नहीं थी एक उदासी छा गयी थी सभी में, जैसे कोई उनका अपना चला गया हो | ऐसा लग रहा था कि जिसके सहारे वो उस घर मे आती थी वो घर अब उनका नहीं रहा था, एक – एक करके वो चली गयी कोई आवाज़ नहीं थी आज उनके उड़ते हुए जाने पर | ना जाने कितने दिनों तक उनका आना ऐसे ही लगा रहा और ज़ब लगा कि अब वो इंसान नहीं है जो उन्हें इतना प्यार देता था, दाना तो अभी भी मिलता है पर वो अपनत्व नहीं था वँहा | उस दिन के बाद वो लौटकर नहीं आयी वँहा फिर कभी |

अक्षत ने उस दिन महसूस किया कि हम तो इंसान हैं तब इतना प्यार और लगाव नहीं महसूस नहीं कर पाते हैं और ये पक्षी जान से भी ज्यादा प्यार और लगाव मानते हैं, जिनके पास कुछ पल भी रह लेते हैं हमसे अच्छे तो ये पशु – पक्षी हैं कम से कम बस प्यार के लिये जीते हैं |

#सभी को दीपावली की अनंत मंगल कामनायें💐💐💐🎆🧨🎆🧨🎆🧨💐💐💐💐

“मन के कलुषित तम को दूर कर ज्ञान का दीपक प्रज्वलित करता है ये त्यौहार ,

ख़ुशियों – प्रेम , दीये एवं रंगोली से सजा संस्कृति का प्रतीक है ये

त्यौहार |
हर मानव के आस व विश्वास की उम्मीद की शुभ्र किरण है ये त्यौहार ,

हर असम्भव को सम्भव व हार को भी जीत में भी बदलने का विश्वास है ये
त्यौहार |”
✍️✍️✍️डॉ गरिमा त्यागी

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