कसक

“मायूसियाँ घेर रहीं थी मेरे मन को,

जीवन की उलझनों ने घेर लिया था मुझकों |

एक कोलाहल मचा था मेरे अंदर फिर भी,

बैचेनी की फड़फड़ाहट में ख़ामोश हो गयी जुबां फिर भी |”

“चाहतें भी अज़ीब होती हैं दिल की,

जो कमजोर बना देती हैं इंसान को|

हिम्मत भी देती हैं, विश्वास भी देती हैं,

पर सच्चाई ना हो अगर रिश्ते में तोड़ देती हैं इंसान को |”

नूतन वर्ष (नववर्ष)

नववर्ष की ये बेला है आयी

सतरंगी सपने मन में सजाये

जिंदगी उमंगों से भरकर ये बोली

मिलकर रहेंगे हम भाई-भाई

पथ है दूर लेकिन सच होंगे सपने

कठिन है डगर रास्तों की लेकिन

सामना हम करेंगे सभी मुश्किलों का

जीवन से हमने सीख यही पायी

लड़ेंगे गिरेंगे उठेंगे फिर एक दिन

खुशियों की डोर जीवन में ये उम्मीद है लायी

नववर्ष की ये बेला है आयी |

हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनायें….. भावों की अभिव्यक्ति का मूर्त रूप हिंदी है देश की उन्नति में पूर्ण सहयोगी हिंदी है ईर्ष्या द्वेष को दूर करने में सहायक हिंदी है मातृभूमि पर मर मिटने की भक्ति का नाम हिंदी है

प्रकाश -पुंज (गुरु)

अज्ञानता के अंधकार को दूर करता है वो पूज्य गुरु है

ज्ञान के दीप की लौ मन में जगाता है वो पूज्य गुरु है

कर्त्तव्य पथ में राह दिखाता है वो पूज्य गुरु है

इस लौ को अवलोकित करने वाले पूज्य गुरु राधाकृष्णन हैं

दुःख-सुख की छाँव में सम्बल जो बनता है वो पूज्य गुरु है

जीवन निराधार है हमारा बिना गुरु के

बच्चा आँखे खोलता है जब इस संसार में

गोद में जिसकी खेलता है वो माता प्रथम पूज्य गुरु है

जो जीवन का पाठ पढ़ाये वो माता गुरु है

कर्त्तव्यों पर चलना सिखाये वो पिता द्वितीय पूज्य गुरु है

कर्त्तव्य पथ में डटे रहना सिखाये वो ही हमारे पूज्य गुरु हैं

जीवन को नई दिशा दिखाये वो पूज्य गुरु है

गुरु ब्रह्मा भी हैं गुरु विष्णु भी हैं गुरु महेश्वर भी हैं

सबका कल्याणकर्त्ता, ज्ञानप्रदाता वो पूज्य गुरु है

चरणों में उनके नित शीश नवायें वो पूज्य गुरु हैं

क्या अर्पण करूँ मैं उन पूज्य गुरुओं को

है शत-शत नमन मेरा उन पूज्य गुरुओं को

मंजिलें सफर में होंसला बढ़ायें वो पूज्य गुरु हैं

जीवन की डगर आसान बनायें वो पूज्य गुरु हैं |

आज़ादी

तिरंगे तेरी शान में वो कुर्बान हो गये

ऐसे वो वीर सपूत थे जो तिरंगे की

आन-बान के लिए शहीद हो गये

इसी तिरंगे की खातिर ही कितनी कोख भी सूनी हो गयीं

कितनी बहिनों की राखी बाट जोहती रह गयीं

गर्व से भरकर वो माँ-बहिनें बोलीं

हर जन्म में तुझसा लाल और वीर मिले

धन्य हैं ऐसे वीर अमर सपूत

देश की खातिर जो अपने प्राणों की आहुति दे गये

धन्य हैं झाँसी की रानी,खुदीराम,उधम,आजाद

धन्य हैं बाल,पाल और लाल,धन्य हैं सुभाषचन्द्र बोस

बापू और पटेल की प्राणों से मिली आजादी धन्य है

लघु से रक्तिम धरती पर प्राणों की आहुति देकर

सीने पर गोली खाकर ही इस आजादी को पाया था

शत-शत बार नमन उन वीरों को

जो प्राण न्योंछावर करके चले गये

सपनों की आजादी को वो सत्य बनाकर चले गये

उनके प्राणों का ये उत्सर्ग खाली ना कभी जायेगा

जो खुले आशमाँ में हँसने और जीने का मौका दे गये

सौ बार नमन उन वीरों को जो इस दुनिया को जीने का स्वप्न दिखा गये

तिरंगे तेरी शान में वो कुर्बान हो गये |

अस्मिता की आवाज़

एक जिन्दा सी लड़की मृत हो गयी जीते जी अस्तित्व खो दिया

नैतिक मूल्यों की विलुप्त सत्ता में उसकी अंतरात्मा पर प्रहार हो रहा

कैसा समाज है ये हमारा जहाँ दोष किसी का दोषी कोई ओर हो रहा

अस्मिता पर उसकी प्रश्नचिन्ह लगा दिए जो बैठे हैं आसीन पदों पर

हैं समाज के ठेकेदार वहीं क्या जीने का भी हक़ वो देंगे क्या

जीवित होकर भी जीने का अधिकार छिन रहा

पुरुष के सत्तामयी समाज में फिर प्रश्न नारी की ही ओर उठ रहे

अधिकारों की बात करते हैं ये लेकिन जीवन का अस्तित्व छीन रहे

ऐसे कृत्यों के दोषी को मानसिक रोगी ही बताकर दोष नारी पर ही मंढ रहे

खुद एक रोग से ग्रस्त समाज ये जीने की परिभाषा बता रहा

कैसी होगी वेशभूषा उसकी चारों ओर यही प्रश्न उठ खडे हुए हैं

पुरुष के गुनाह को एक ग़लतीभर बताकर नारी के जीवन की स्वतंत्रता का अधिकार छीन रहे

आये दिन बलात्कार हत्या हो रहीं बस मोमबत्ती लगाकर ये भी अपने कर्तव्यों को पूर्ण मानते

आधुनिकता के समाज में खुद को ये आधुनिक हैं कहते

क्या यही समाज का आधुनिक रूप है

जो जीने की बात हैं करते वही कदम कदम पर अपमानित कर रहे

क्या यही दोष है उसका केवल जीवन जीने को अपना अधिकार माना

एक उसकी अस्मिता का दोषी, एक उसके अधिकारों का दोषी

फिर भी इस समाज में दोषी नारी

ऐसा होता है आखिर क्यों हर बार यही प्रश्न उठ होते खडे हैं

न्याय के लिए भी दर दर आज फिर से भटक रही है नारी

दोषी घूम रहा है खुलेआम फिर भी दोषी हो गयी नारी

बस दोष यही था उसका कि पुरुष के सत्तामयी समाज में पँख फैलाकर उसने जीना चाहा

अभी तो उड़ भी नहीं सकी थी ठीक से,

पंखो को उसके काट दिया, ख़त्म कर दी पहचान उसकी

उसके उड़ने को दोषी बना दिया

क्यों नहीं समझते हैं सब जन समाज में

कपड़ो को वो दोष दे देते हैं, कपड़ो से ही अगर बलात्कार रुकते

तो खिलौनों से खेलती बच्चियाँ किसी की हैवानियत का शिकार ना बनती

ना रोते आज माता पिता बेटियों को जन्म देकर

भयाक्रांत इस समाज में डर-डरकर हैं वो जी रहे

ये कैसा समाज है जो हर बार दोष नारी पर ही गढ़ रहा |

Create your website at WordPress.com
Get started