डायरी

सामयिक परिवेश यूपी अध्याय पटल पर अप्रवासी भारतीय विशेषांक ई पत्रिका का विमोचन समारोह एवं कवि सम्मेलन का आयोजन 💐💐💐
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जय माता दी 🙏🙏🙏 सभी को नवरात्रि की अनंत मंगल कामनायें 💐💐💐

पतन

https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=1828667877288531&id=100004360087771
साहित्य सुमन मंच की ‘विशेष रचना’ के तहत पूरे हफ्ते किसी खास शीर्षक पर मंच की विशिष्ठ महिला रचनाकार की रचना मेरी ओर से प्रेषित की जाती है.
इस हफ्ते का शीर्षक है ‘पतन’. अत: इस क्रम में ‘पतन’ शीर्षक पर मैं आज की रचना मंच की बेहद सक्रिय व उत्कृष्ट लेखन पर बेहतरीन कार्य करने वाली रचनाकार डॉ गरिमा त्यागी जी की प्रेषित कर रही हूँ. इनकी रचना आप भी अवश्य पढ़ें…✍️

पतन

कैसी हाशिये पर आ गयी है ज़िंदगी,

कभी मुफलिसी, कभी बेचारगी |

गिराकर ज़मीर भी अपना,

बैठ जाते हैं ऊँचे पायदानों पर,

हारती है बस भूखमरी, लाचारगी,

कैसी हाशिये पर आ गयी है ज़िंदगी |

हर तरफ भरी है दर्द ओर माज़ूरी,

कैसी हाशिये पर आ गयी है ज़िंदगी |

पतन अब किसे कहेंगे हम यहाँ,

पतन भावनाओं का हो रहा हो जहाँ |

बिक रहे हैं अब मूल्य भी अब तो हर चौराहे पर,

हवाओं में भी रूह के पतन की अब बढ़ रही है गंदगी |

रो – रोकर कथा ये कह रही है नित नयी,

कैसी हाशिये पर आ गयी है ज़िंदगी |

डॉ. गरिमा त्यागी (Akshrash sahitya)

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होली

रंग-रूप अलग हैं ख्याल,तरंगअलग हैं,
इस वसुधा के तो देखो ढाल और ढंग
अलग हैं।
सभी को निकट से निकटतम दिल के बना
लो,
मिल जाते हैं सब रंग इस फाग में,
होली का ये तो चलन अलग है।
✍️✍️✍️डॉ.गरिमा त्यागी

सभी को होली की अनंत शुभकामनायें 💐💐💐

महादेवी वर्मा जी

हिंदी साहित्य के छायावादी युग की अग्रणी लेखिका तथा आधुनिक मीरा के नाम से प्रसिद्ध महादेवी वर्मा जी को उनके जन्मदिवस पर शत शत नमन🙏🙏
आज इनके जन्मदिवस पर एक विशेष रचना डॉ गरिमा त्यागी जी की कलम से…✍

प्रेम की यूँ तो दीवानी थी वो,

पीड़ा की यूँ तो पुजारिन थी वो,

आधुनिक युग की मीरा उनको कहते सभी |

हर दिल की वेदना की गायिका थी वो |

व्योम में विस्तृत नील अंबुद थी वो,

अभ्र के फ़लक की सुनहरी दामिनी थी वो |

एक शीतल निर्झरिणी की प्रतिरुप थी जैसे,

यूँ तो गीतों की बीन भी रागिनी भी थी वो |

डॉ. गरिमा त्यागी(Akshrash sahitya)

डायरी

मुझे मंच सह संचालिका सम्मान पत्र प्रदान करने के लिये “लफ्जों का कमाल”मंच का बहुत – बहुत आभार 🙏🙏🙏😊❤️😊😊💐💐💐

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कुदरत

https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=1821403908014928&id=100004360087771
साहित्य सुमन मंच की ‘विशेष रचना’ के तहत पूरे हफ्ते किसी खास शीर्षक पर मंच की विशिष्ठ महिला रचनाकार की रचना मेरी ओर से प्रेषित की जाती है.
इस हफ्ते का शीर्षक है ‘कुदरत’. आज इस हफ्ते का पहला दिन है. अत: इस क्रम में ‘कुदरत’ शीर्षक पर पहली रचना मैं बेहद सक्रिय रचनाकार डॉ गरिमा त्यागी जी की प्रेषित कर रही हूँ. इनकी रचना आप भी अवश्य पढ़ें…✍️

कुदरत

कुदरत के खेल देखो होते हैं अनोखे,

कहीं बेबसी, लाचारी से सजी है ज़िंदगी,

कहीं दुखों का नामोनिशान नहीं है,

जीवन जीने के भी नये सिखा देती हैं सलीके,

कुदरत के खेल देखो होते हैं अनोखे |

एक ओर जहाँ गरीबी आँसू बहा रही,

वहीं खिलौनों -सी मासूमियत जिम्मेदारियों में दब गयी,

सतरंगी रंगों से रंगी है अनोखी दुनिया,

इस ज़िंदगी के रंग होते हैं अनूठे,

कुदरत के खेल देखो होते हैं अनोखे |

डॉ गरिमा त्यागी (Akshrash sahitya)

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क़दम

https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=518849335786662&id=100029848008551 साहित्य सुमन मंच की ‘विशेष रचना’ के तहत पूरे हफ्ते किसी खास शीर्षक पर मंच की विशिष्ठ महिला रचनाकार की रचना मेरी ओर से प्रेषित की जाती है.
इस हफ्ते का शीर्षक है ‘कदम’. अत: इस क्रम में आज मैं मंच की चर्चित काबिल रचनाकार डॉ गरिमा त्यागी जी (Akshrash sahitya) की प्रेषित कर रही हूँ. इनकी रचना आप भी अवश्य पढ़ें…✍️

क़दम

क़दम-दर -क़दम पग हम बढ़ाते गये,

अंधेरों से भी हम जंग यूँ लड़ते गये |

कंटक बिछे थे राह मे

शूल बनकर मेरे,

हर शूल पर पुष्प हम बिछाते गये |

डगर आसाँ नहीं होती यूँ तो ज़िंदगी की कभी,

अब अंधेरों से हमने कर ली थी दोस्ती |

उम्मीदों का दीया पर दिल मे जलता रहा,

आस थी हमें आएगी कभी झरोखों से रोशनी |

निशां कदमों के हम अब बनाते गये,

क़दम -दर -क़दम पग हम बढ़ाते गये |

डॉ. गरिमा त्यागी (Akshrash sahitya)

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